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ARN
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आपका दिल बेचैन रहता है। धड़कनें जब तब बढ़ जाती हैं। आंखें नम हो जाती हैं और आप शोक के सागर में डूब जाते हैं। आपके चारों ओर भीड़ है,शोर है और लोग बातें कर रहे हैं। लेकिन आप सुन्न हैं। न कुछ सुन पा रहे हैं और न ही कुछ सोच पा रहे हैं। बस खुद को अकेला, हताश, हारा हुआ और थका हुआ महसूस कर रहे हैं। आप कोई काम करते हैं तो उसमें मन नहीं लगता। हंसते हैं तो अपराध बोध महसूस होता है। आपको हर वक्त महसूस होता है कि आपको वो नहीं मिला जो मिलना चाहिए और दुनिया का हर दूसरा इंसान आपसे ज्यादा सुखी है। आपको हरदम ऐसा लगता है कि आपको कुछ और करना चाहिए, लेकिन आप वो नहीं कर पा रहे हैं। जबकि आपको यह भी पता नहीं होता कि आखिर आपको करना क्या चाहिए..।
साइंस में इसे 'न्यूरोस्थेनिया' कहा गया है ।
और यह नाम दिया है चर्चित अमरीकी
न्यूरोलॉजिस्ट जार्ज मिलर बियर्ड ने।
मनोचिकित्सक डॉ संजय गर्ग कहते हैं कि
इस सिचुएशन में मरीज एक साथ डिप्रेशन
एंग्जायटीपैलपिटेशन (धड़कन) और
थकान का शिकार हो जाता है। आज के
हाइटेक और भौतिकवादी युग में इंसान की
महत्वाकांक्षाएं हद से ज्यादा अवास्तविकता
की हद तक पहुंच गई हैं। अपने आसपास
लोगों को अनाप शनाप खर्च करतेउच्च
स्तरीय जीवन व्यतीत करते देख हमारी
लालसाएं बढ़ने लगी हैं। हम अपनी सीमाओं
और वास्तविकताओं को भूलने लगे हैं।
सिर्फ धन ही नहीं बल्कि किसी टैलेंट (डांस
आर्टम्यूजिक) या शारीरिक सौष्ठव के
मामले में भी हो सकता है। तकनीक का
ओवरयूज भी हमें सोचने और देखने के
लिए ग्लोबल परिदृश्य उलब्ध करवा रहा है।
इसके चलते भी हमारी उम्मीदें बढ़ने लगी हैं।
हमारे शरीर का हर एक एक्शन तकनीक से
प्रभावित होने लगा है। इनबॉक्स मैसेज की
बीप या फोन की घंटी बजते ही हम
बिजली की गति से उसे देखने के लिए
दौड़ते हैं। इससे जिंदगी की गुणवत्ता कम हुई
है। आराम की आदत छूटती जा रही है। न
शरीर को आराम मिलता है, न मन को।
होते हैं वो ज्यादा से ज्यादा काम करने लगते हैं और खुद को व्यस्त रखने लगते हैं। ये यदा कदा खुद को खुश करने के जतन भी करते हैं। यह बेचैनी सिर्फ गरीब या अभावग्रस्त लोग नहीं बल्कि पावरफुल और संपन्न लोग भी महसूस करते हैं। इसलिए इसका आर्थिक स्तर से कोई मतलब नहीं।
की वास्तविकता से रूबरू होना पड़ेगा। अपनी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक क्षमता
और सीमा को समझना पड़ेगा। अपनी जरूरतों का सही सही आंकलन करना पड़ेगा। ध्यान
रखना होगा कि किसी भी लक्ष्य तक हम
रियलिस्टिक होकर ही बढ़ सकते हैं। कल्पनाओं के
सागर में गोते लगाकर नहींहमें समझाना होगा कि
हर किसी को हर चीज नहीं मिल सकती। जो चीजें
हमारे पास हैं, वो हासिल करना हमारा मकसद है।
। हमारी जो मूलभूत जरूरतें हैं, उन्हीं को पूरी
करना हमारी प्राथमिकता है। हां हमें भी अपने जीवनस्तर या अन्य क्षमताओं को बढ़ाने का हक है
और बढ़ाना भी चाहिए । लेकिन रातों रात कुछ नहीं होगा, धीरे धीरे होगा। कदम दर कदम होगा। बस, न्यूरोस्थिजिया के मरीज को कोई सलाहकार परिजन मित्र या फिर वह खुद
ही यह समझाने में कामयाब हो जाए, तो उसकी जिंदगी वापस पटरी पर लौटने लगेगी।
बीमारी है ये बेचैनी
दरअसल यह एक बीमारी है। मेडिकलसाइंस में इसे 'न्यूरोस्थेनिया' कहा गया है ।
और यह नाम दिया है चर्चित अमरीकी
न्यूरोलॉजिस्ट जार्ज मिलर बियर्ड ने।
मनोचिकित्सक डॉ संजय गर्ग कहते हैं कि
इस सिचुएशन में मरीज एक साथ डिप्रेशन
एंग्जायटीपैलपिटेशन (धड़कन) और
थकान का शिकार हो जाता है। आज के
हाइटेक और भौतिकवादी युग में इंसान की
महत्वाकांक्षाएं हद से ज्यादा अवास्तविकता
की हद तक पहुंच गई हैं। अपने आसपास
लोगों को अनाप शनाप खर्च करतेउच्च
स्तरीय जीवन व्यतीत करते देख हमारी
लालसाएं बढ़ने लगी हैं। हम अपनी सीमाओं
और वास्तविकताओं को भूलने लगे हैं।
सिर्फ धन ही नहीं बल्कि किसी टैलेंट (डांस
आर्टम्यूजिक) या शारीरिक सौष्ठव के
मामले में भी हो सकता है। तकनीक का
ओवरयूज भी हमें सोचने और देखने के
लिए ग्लोबल परिदृश्य उलब्ध करवा रहा है।
इसके चलते भी हमारी उम्मीदें बढ़ने लगी हैं।
हमारे शरीर का हर एक एक्शन तकनीक से
प्रभावित होने लगा है। इनबॉक्स मैसेज की
बीप या फोन की घंटी बजते ही हम
बिजली की गति से उसे देखने के लिए
दौड़ते हैं। इससे जिंदगी की गुणवत्ता कम हुई
है। आराम की आदत छूटती जा रही है। न
शरीर को आराम मिलता है, न मन को।
गलत आदतों का सहारा
इस अकेलेपन और हताशा से उबरने के लिए कुछ लोग ड्रग्स, शराब, सिगरेट का सहारा लेने लगते हैं , तो कुछ शहर की बदनाम गलियों में भटकने लगते हैं। कई नींद की गोलियां लेने लगते हैं और कई अपने आपको सजा देकर धरे धीरे छीजने लगते हैं और बीमार रहने लगते हैं। कुछ लोग जो समझदारहोते हैं वो ज्यादा से ज्यादा काम करने लगते हैं और खुद को व्यस्त रखने लगते हैं। ये यदा कदा खुद को खुश करने के जतन भी करते हैं। यह बेचैनी सिर्फ गरीब या अभावग्रस्त लोग नहीं बल्कि पावरफुल और संपन्न लोग भी महसूस करते हैं। इसलिए इसका आर्थिक स्तर से कोई मतलब नहीं।
इस बेचैनी से निपटने के लिए
न्यूरेस्थेनिया से निपटने के लिए हमें खुदकी वास्तविकता से रूबरू होना पड़ेगा। अपनी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक क्षमता
और सीमा को समझना पड़ेगा। अपनी जरूरतों का सही सही आंकलन करना पड़ेगा। ध्यान
रखना होगा कि किसी भी लक्ष्य तक हम
रियलिस्टिक होकर ही बढ़ सकते हैं। कल्पनाओं के
सागर में गोते लगाकर नहींहमें समझाना होगा कि
हर किसी को हर चीज नहीं मिल सकती। जो चीजें
हमारे पास हैं, वो हासिल करना हमारा मकसद है।
। हमारी जो मूलभूत जरूरतें हैं, उन्हीं को पूरी
करना हमारी प्राथमिकता है। हां हमें भी अपने जीवनस्तर या अन्य क्षमताओं को बढ़ाने का हक है
और बढ़ाना भी चाहिए । लेकिन रातों रात कुछ नहीं होगा, धीरे धीरे होगा। कदम दर कदम होगा। बस, न्यूरोस्थिजिया के मरीज को कोई सलाहकार परिजन मित्र या फिर वह खुद
ही यह समझाने में कामयाब हो जाए, तो उसकी जिंदगी वापस पटरी पर लौटने लगेगी।
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